
Jharkhand High Court: झारखंड HC ने मनरेगा फंड में हेराफेरी और गबन के एक पुराने मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए तत्कालीन ब्लॉक प्रोग्राम ऑफिसर सुष्मिता प्रिया उर्फ सुष्मिता गुप्ता की याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने निचली अदालत के उस आदेश पर अपनी मुहर लगा दी है, जिसमें उन्हें आपराधिक मुकदमे से डिस्चार्ज यानी बरी करने से साफ मना कर दिया गया था। हाईकोर्ट के इस सख्त फैसले के बाद अब पूर्व ब्लॉक प्रोग्राम ऑफिसर को इस मामले में नियमित ट्रायल और आपराधिक मुकदमे का सामना करना पड़ेगा।

कागजों पर ही बना डाला ट्यूबवेल, तीन लाख से ज्यादा की राशि गबन करने का आरोप
यह पूरा मामला रांची जिले के मांडर थाना कांड संख्या 109/2018 से जुड़ा हुआ है। वित्तीय वर्ष 2010-11 के दौरान मनरेगा योजना के तहत जलेश्वर लोहरा के नाम पर ट्यूबवेल निर्माण के लिए तीन लाख ग्यारह हजार रुपये से अधिक का सरकारी फंड स्वीकृत किया गया था। जांच में यह खुलासा हुआ कि धरातल पर ट्यूबवेल का कोई वास्तविक निर्माण कार्य कराया ही नहीं गया और कागजी खानापूर्ति कर पूरी स्वीकृत राशि का गबन कर लिया गया। मामले में पुलिस की तफ्तीश के बाद संबंधित आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई थी, जिस पर अदालत ने संज्ञान लेकर कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ाई थी।

सुपरविजन में लापरवाही बर्दाश्त नहीं, हाईकोर्ट ने बचाव पक्ष की दलीलों को किया खारिज
अदालत में सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि निर्माण स्थल का भौतिक सत्यापन और ग्राउंड लेवल पर निगरानी करने का जिम्मा अन्य कर्मचारियों का था, लिहाजा इसमें ब्लॉक प्रोग्राम ऑफिसर की कोई सीधी या व्यक्तिगत भूमिका नहीं बनती। हालांकि HC ने केस डायरी और निरीक्षण रिपोर्ट का बारीकी से अध्ययन करने के बाद इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी विकास परियोजना का नियमित पर्यवेक्षण करना मुख्य अधिकारी की अनिवार्य प्रशासनिक जिम्मेदारी होती है। सुपरविजन में बरती गई भारी लापरवाही के चलते ही इतने बड़े सरकारी फंड का गबन मुमकिन हुआ, जिसके चलते अदालत ने आरोपी अधिकारी की पुनरीक्षण याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया।


