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दो महीने में सरेंडर करे दोषी नहीं तो सीधे जेल भेजो…, 2003 के रेप केस में जस्टिस प्रदीप श्रीवास्तव की अदालत का कड़ा रुख

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Jharkhand High Court : झारखंड हाईकोर्ट ने करीब 22 वर्ष पुराने दुष्कर्म के एक मामले में निचली अदालत के फैसले पर मुहर लगाते हुए दोषी कड़ू लोहरा की अपील खारिज कर दी है। हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति प्रदीप श्रीवास्तव की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सात साल के सश्रम कारावास की सजा को यथावत रखा है। इसके साथ ही अदालत ने दोषी की जमानत याचिका निरस्त करते हुए उसका बेल बॉन्ड रद्द कर दिया है।

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दो माह के भीतर ट्रायल कोर्ट में सरेंडर करने का सख्त आदेश

अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट निर्देश दिया है कि अभियुक्त कड़ू लोहरा दो महीने के भीतर संबंधित निचली अदालत में आत्मसमर्पण (सरेंडर) करे, ताकि वह अपनी शेष सजा भुगत सके। उच्च न्यायालय ने यह भी निर्देशित किया है कि यदि अभियुक्त निर्धारित समय सीमा के अंदर सरेंडर नहीं करता है, तो ट्रायल कोर्ट उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट और कानूनी कार्रवाई कर उसे अविलंब गिरफ्तार कर जेल भेजना सुनिश्चित करे।

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खूंटी के कर्रा थाना क्षेत्र में वर्ष 2003 में हुई थी वारदात

यह पूरा मामला खूंटी जिले के कर्रा थाना क्षेत्र (कांड संख्या 21/2003) से जुड़ा हुआ है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, 8 अप्रैल 2003 को पीड़िता अपने बाड़ी (खेत) में काम कर रही थी। उसी दौरान अभियुक्त कड़ू लोहरा अचानक वहां पहुंचा और पीड़िता को चाकू दिखाकर जान से मारने की धमकी दी। इसके बाद उसने जबरन दुष्कर्म की घटना को अंजाम दिया। वारदात के बाद पीड़िता ने रोते हुए अपनी भाभी और ग्रामीणों को आपबीती सुनाई, जिसके बाद आक्रोशित ग्रामीणों ने तत्परता दिखाते हुए आरोपी को दौड़ाकर पकड़ा और पुलिस के हवाले कर दिया था।

ट्रायल कोर्ट ने 2004 में सुनाई थी 7 साल की सजा

मामले की सुनवाई करते हुए ट्रायल कोर्ट ने 28 सितंबर 2004 को कड़ू लोहरा को भारतीय दंड विधान के तहत दुष्कर्म का दोषी ठहराया था और 29 सितंबर 2004 को सात वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। निचली अदालत के इस फैसले के खिलाफ अभियुक्त ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल कर राहत की गुहार लगाई थी। हालांकि हाईकोर्ट ने साक्ष्यों और गवाहों के बयानों को पुख्ता मानते हुए निचली अदालत के फैसले को पूरी तरह सही ठहराया और अपील खारिज कर दी।

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