
infertility news: शादी के 5 साल बीत जाने के बाद भी माता-पिता न बन पाने का दर्द झेल रहे एक युवा दंपत्ति की कहानी इन दिनों चर्चा में है। पंजाब से फर्टिलिटी एक्सपर्ट डॉक्टर महिमा के पास पहुंचे इस 31 वर्षीय कपल ने गर्भधारण (प्रेग्नेंसी) के लिए हर मुमकिन कोशिश की, लेकिन हर बार उन्हें निराशा ही हाथ लग रही थी। आखिरकार डॉक्टर की सतर्कता और एक पुराने टेस्ट को दोबारा कराने की सलाह ने 5 साल से छिपे असली सच का पर्दाफाश कर दिया।

सब कुछ ‘नॉर्मल’ होने के बावजूद नहीं हो रही थी प्रेग्नेंसी

कपल की पूरी मेडिकल हिस्ट्री देखने के दौरान पता चला कि महिला के पीरियड्स बिल्कुल नियमित थे और ओव्यूलेशन भी सही समय पर हो रहा था। यहां तक कि ओव्यूलेशन इंडक्शन जैसी प्रक्रिया भी अपनाई जा चुकी थी। महिला के पास उसकी ‘एचएसजी’ (HSG) टेस्ट रिपोर्ट भी मौजूद थी, जिसमें बताया गया था कि उसकी फैलोपियन ट्यूब्स पूरी तरह खुली (ओपन) हैं। कागजों पर सब कुछ बिल्कुल ठीक और सामान्य दिख रहा था, लेकिन इसके बावजूद प्रेग्नेंसी नहीं ठहर रही थी।

पुराने टेस्ट की ‘नॉर्मल’ रिपोर्ट पर डॉक्टर को हुआ शक

मरीज की बातें सुनने और पुरानी रिपोर्ट्स का बारीकी से अध्ययन करने के बाद डॉक्टर महिमा को एचएसजी टेस्ट की रिपोर्ट पर कुछ संशय हुआ। उन्होंने महिला को वही टेस्ट दोबारा करवाने के निर्देश दिए। इस पर महिला हैरान रह गई और पूछने लगी कि जब रिपोर्ट पहले से ही नॉर्मल है तो वह दोबारा यह टेस्ट क्यों कराए? हालांकि, डॉक्टर के समझाने पर महिला ने दोबारा जांच कराई।
री-टेस्ट आते ही खुला राज, बंद निकलीं दोनों फैलोपियन ट्यूब्स

जब दोबारा कराए गए टेस्ट की रिपोर्ट सामने आई, तो प्रेग्नेंसी न होने की असली वजह स्पष्ट हो गई। पुरानी रिपोर्ट के उलट, नई रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि महिला की दोनों फैलोपियन ट्यूब्स असल में पूरी तरह से ब्लॉक (बंद) थीं। डॉक्टर महिमा ने बताया कि फैलोपियन ट्यूब ही वह स्थान है जहां एग (अंडा) और स्पर्म (शुक्राणु) का मिलन होता है। अगर दोनों ट्यूब्स बुरी तरह क्षतिग्रस्त या ब्लॉक हों, तो स्पर्म एग तक नहीं पहुंच पाते और प्राकृतिक रूप से कंसीव करना नामुमकिन हो जाता है।
इनफर्टिलिटी का बड़ा कारण है ट्यूबल ब्लॉकेज
विशेषज्ञों के अनुसार, महिलाओं में निसंतानता (इनफर्टिलिटी) के लगभग 25 से 35 प्रतिशत मामलों का मुख्य कारण फैलोपियन ट्यूब से जुड़ी यही बीमारियां और ब्लॉकेज होती हैं। ऐसे मामलों में सिर्फ कागजी रिपोर्ट्स पर निर्भर रहने के बजाय सही समय पर सटीक जांच और जरूरत पड़ने पर री-टेस्ट कराना बेहद जरूरी साबित होता है। 5 साल बाद सही कारण सामने आने के बाद अब इस कपल का सही दिशा में इलाज संभव हो सकेगा।


