
सीतामढ़ी: सीतामढ़ी के रहने वाले वैज्ञानिक डॉ. सुजीत कुमार ठाकुर कैंसर के संभावित नए उपचार की दिशा में चल रहे एक शोध से जुड़े हैं। चेन्नई की बालमन ईश्वरन बायोमेडिसिन एंड मटेरियल साइंस प्राइवेट लिमिटेड (BEMMS) ने ICMR-NARFBR के सहयोग से जल में घुलनशील नैनोकार्बन यौगिकों का प्रीक्लिनिकल अध्ययन किया है।

शोध में नैनोकार्बन के कुछ फॉर्मूलेशन से स्तन कैंसर के ट्यूमर की वृद्धि कम होने और ट्यूमर ऊतक को नुकसान पहुंचने के संकेत मिले हैं। हालांकि, यह अध्ययन अभी चूहों पर किया गया है, इसलिए इसे इंसानों के लिए कैंसर के सफल इलाज का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

चूहों पर हुआ प्रीक्लिनिकल परीक्षण
अध्ययन ICMR-National Animal Resource Facility for Biomedical Research (NARFBR), हैदराबाद में किया गया। शोधकर्ताओं ने मानव स्तन कैंसर सेल लाइन MDA-MB-231 से विकसित ट्यूमर वाले NOD-SCID चूहों पर तीन अलग-अलग नैनोकार्बन फॉर्मूलेशन का परीक्षण किया। शोध के दौरान फुलरेज़िरमैन और SWCNT-Mn(II) कॉम्प्लेक्स से उपचारित समूहों में अनुपचारित समूह की तुलना में ट्यूमर की वृद्धि कम देखी गई।
फुलरेज़िरमैन से उपचारित कुछ चूहों के ट्यूमर ऊतक में 40 से 90 प्रतिशत तक नेक्रोसिस दर्ज किया गया। वहीं SWCNT फॉर्मूलेशन वाले समूह में तीन में से दो जानवरों में करीब 40 प्रतिशत नेक्रोसिस देखा गया। अध्ययन के दौरान उपचार से जुड़े किसी गंभीर क्लिनिकल लक्षण या मृत्यु की सूचना नहीं मिली और चूहों के शरीर का वजन भी सामान्य रूप से स्थिर रहा।
ट्यूमर के आकार में भी दिखा अंतर
अध्ययन के आंकड़ों के मुताबिक, अनुपचारित चूहों में औसत ट्यूमर का आयतन 35वें दिन 54.86 घन मिलीमीटर था, जो 68वें दिन बढ़कर 486.53 घन मिलीमीटर हो गया।
इसके मुकाबले फुलरेज़िरमैन से उपचारित समूह में ट्यूमर का आयतन 54.54 से बढ़कर 212.98 घन मिलीमीटर और SWCNT समूह में 33.49 से बढ़कर 169.45 घन मिलीमीटर रहा। शोधकर्ताओं के अनुसार, ये परिणाम नैनोकार्बन फॉर्मूलेशन की संभावित कैंसर-रोधी क्षमता के संकेत देते हैं।
करीब एक दशक से नैनोकार्बन पर काम कर रहे डॉ. सुजीत
इस शोध में बिहार के लिए खास बात यह है कि इसमें योगदान देने वाले डॉ. सुजीत कुमार ठाकुर मूल रूप से सीतामढ़ी के मानिक चौक-उत्तरी, कमलधा के रहने वाले हैं। वह करीब एक दशक से नैनोकार्बन सामग्री और उनके संभावित कैंसर-रोधी इस्तेमाल पर शोध कर रहे हैं।
डॉ. सुजीत BEMMS-FITT, IIT दिल्ली से जुड़े वैज्ञानिक हैं। कैंसर के खिलाफ नैनोकार्बन के इस्तेमाल से जुड़े शुरुआती इन-विट्रो अध्ययन रीजनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी (RCB), फरीदाबाद में वरिष्ठ प्रोफेसर प्रसेनजित गुच्छैत की प्रयोगशाला में किए गए थे।
बाद में रिलायंस लाइफ साइंसेज, मुंबई में भी अलग-अलग कैंसर सेल लाइनों पर इन-विट्रो परीक्षण किए गए। इनमें सर्वाइकल, कोलन, ब्रेस्ट, लंग और ट्रिपल-नेगेटिव ब्रेस्ट कैंसर से जुड़ी सेल लाइनों को शामिल किया गया। इस शोध से संबंधित एक भारतीय पेटेंट भी 31 जनवरी 2023 को प्रदान किया गया था।
इंसानों के इलाज तक पहुंचने में अभी कई चरण बाकी
शोध के मौजूदा परिणाम उत्साहजनक जरूर हैं, लेकिन इसे अभी कैंसर की नई दवा या इंसानों के लिए तैयार इलाज कहना जल्दबाजी होगी। चूहों में मिले परिणामों को मानव उपचार की सफलता या सुरक्षा का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
मानव उपयोग तक पहुंचने से पहले फॉर्मूलेशन को अंतिम रूप देने, बड़े पैमाने पर उत्पादन, विस्तृत टॉक्सिसिटी अध्ययन और आगे के प्रीक्लिनिकल व क्लिनिकल परीक्षण जैसे कई चरणों से गुजरना होगा।


