
Ranchi: GST काउंसिल की अहम बैठक में झारखंड ने देश की ऊर्जा सुरक्षा में अपने योगदान का हवाला देते हुए खनिज-समृद्ध राज्यों के वित्तीय और पर्यावरणीय अधिकारों का मुद्दा बेहद पुरजोर तरीके से उठाया है। राज्य सरकार के प्रतिनिधि ने केंद्रीय वित्त मंत्री और काउंसिल के सदस्यों के सामने साफ किया कि गंतव्य-आधारित (Destination-based) कर प्रणाली की वजह से झारखंड जैसे संसाधन-उत्पादक राज्यों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। देश का 23.27% कोयला भंडार रखने वाले राज्य ने मांग की है कि या तो कोयले को GST के दायरे से बाहर कर उस पर राज्यों को पूर्ववत VAT लगाने की अनुमति दी जाए, या फिर पर्यावरणीय क्षति और राजस्व घाटे की भरपाई के लिए एक ठोस वित्तीय संतुलन ढांचा तैयार किया जाए।

देश का 23% कोयला हमारे पास, लेकिन बिजली उत्पादन का बड़ा हिस्सा दूसरे राज्यों में
काउंसिल के सामने आंकड़े रखते हुए बताया गया कि झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के पास देश के कुल कोयला भंडार का करीब 57% हिस्सा मौजूद है। इसके बावजूद पूर्वी राज्यों में उपयोगिता-आधारित बिजली उत्पादन क्षमता सिर्फ 10% के आसपास है, जबकि पश्चिमी राज्यों में 35%, दक्षिणी क्षेत्र में 27.5% और उत्तरी राज्यों में 27.3% बिजली पैदा हो रही है। दलील दी गई कि झारखंड का कोयला पूरे देश में अपने खनन मूल्य से कई गुना ज्यादा आर्थिक मूल्य पैदा करता है, लेकिन खनन के बाद गड्ढे, उजड़े जंगल, प्रदूषित पानी, विस्थापन और पर्यावरण की दीर्घकालिक बर्बादी सिर्फ झारखंड के हिस्से आती है। वर्तमान GST व्यवस्था में उपभोग वाले राज्यों को सारा टैक्स मिल जाता है और झारखंड को इन समस्याओं से निपटने के लिए जरूरी राजस्व तक नहीं मिल पा रहा।

कोयले पर VAT लगाने की मिले छूट, बिजली पर भी घटेगा टैक्स
झारखंड ने समाधान सुझाते हुए प्रस्ताव रखा कि कोयले को GST से बाहर कर राज्यों को इस पर VAT लगाने की मंजूरी मिले। ऐसा होने पर उत्पादक राज्य अंतर-राज्यीय आवाजाही पर 2% CST भी लगा सकेंगे। वर्तमान IGST मॉडल से उत्पादक राज्यों को कोई कर लाभ नहीं मिलता। यदि यह बदलाव किया जाता है, तो कोयला-उत्पादक राज्यों की कमाई बढ़ेगी और साथ ही बिजली उत्पादन पर लगने वाला कर का बोझ भी 18% से घटकर सीधे 5% पर आ जाएगा, जिससे आम उपभोक्ताओं और उद्योगों दोनों को राहत मिलेगी। इसके साथ ही GST डेटा में पूरी पारदर्शिता लाते हुए राज्य-वार और HSN-वार स्रोत, गंतव्य, ITC और सेटलमेंट स्टेटमेंट को अनिवार्य करने का आग्रह किया गया।
हजारों करोड़ का राजस्व घाटा और 1.36 लाख करोड़ का पुराना बकाया
बैठक में झारखंड पर पड़ रहे वित्तीय बोझ का पूरा कच्चा-चिट्ठा पेश किया गया। राज्य को दरों के युक्तिकरण से लगभग 4,000 करोड़ रुपये, योजनाओं की फंडिंग व्यवस्था बदलने से 4,000 करोड़ रुपये और MMDR कानून में हालिया संशोधनों से करीब 14,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ या नुकसान हुआ है। इसके अलावा केंद्र की तरफ लगभग 1.36 लाख करोड़ रुपये की पुरानी बकाया राशि भी फंसी हुई है। वहीं GST कंपनसेशन सेस खत्म होने से हर साल लगभग 2,500 करोड़ रुपये का सीधा राजस्व घाटा हो रहा है। राज्य ने इन तमाम वित्तीय नुकसानों की भरपाई के लिए केंद्र से तुरंत वैकल्पिक सहायता पैकेज की मांग की।
पारिस्थितिक संतुलन ढांचा बनाने का नया प्रस्ताव
झारखंड ने काउंसिल के सामने एक पूरक ‘संसाधन-स्रोत और पारिस्थितिक संतुलन ढांचा’ (Resource-Origin and Ecological Equalisation Framework) का प्रस्ताव रखा। इसके तहत गंतव्य सिद्धांत को बनाए रखते हुए भी खनिज देने वाले राज्यों को विशेष वेटेज दिया जा सकेगा। इसमें खनन के लिए नष्ट हुए जंगलों, भूमि सुधार की लागत, जल प्रदूषण, विस्थापित आदिवासी आबादी के पुनर्वास और भविष्य में कोयला खत्म होने के बाद होने वाले आर्थिक बदलावों के आधार पर राज्यों को अलग से फंड मिलना चाहिए। राज्य ने स्पष्ट किया कि सहकारी संघवाद का असली मतलब तभी पूरा होगा जब राष्ट्रीय विकास के लाभ और उसकी पर्यावरणीय लागत का बंटवारा सभी राज्यों के बीच पूरी तरह निष्पक्ष और बराबरी के आधार पर हो।


