
New Delhi: देश के अलग-अलग शहरों में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हुए प्रदर्शनों की कवरेज के दौरान पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने और उनके साथ कथित दुर्व्यवहार के मामले सामने आए हैं. रिपोर्ट के अनुसार, 10 और 11 अक्टूबर को दिल्ली, अहमदाबाद और पुणे में कम से कम 43 पत्रकारों को अस्थायी रूप से हिरासत में लिया गया. इनमें कई पत्रकारों के साथ मारपीट, धक्का-मुक्की और रिपोर्टिंग में बाधा डालने की शिकायतें भी सामने आईं.

दिल्ली में सबसे ज्यादा पत्रकार हिरासत में लिए गए
CPJ के मुताबिक, दिल्ली में दो दिनों के दौरान कम से कम 39 पत्रकारों को हिरासत में लिया गया. इनमें कई मीडिया संस्थानों के रिपोर्टर, स्वतंत्र पत्रकार और डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े पत्रकार शामिल थे. कुछ पत्रकारों का आरोप है कि प्रेस कार्ड दिखाने के बावजूद उन्हें पुलिस ने रोका और हिरासत में ले लिया.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कुछ पत्रकारों को बसों में बैठाकर दूसरे स्थानों पर ले जाया गया. कुछ मामलों में मोबाइल फोन जब्त करने और रिकॉर्ड किए गए वीडियो हटाने का दबाव बनाने की शिकायतें भी दर्ज की गईं।.
रिपोर्टिंग के दौरान मारपीट और बदसलूकी के आरोप
रिपोर्ट के अनुसार, कम से कम पांच पत्रकारों ने पुलिस की ओर से शारीरिक हमला किए जाने की बात कही. पत्रकारों के मुताबिक, कुछ को धक्का दिया गया, जबकि कुछ के साथ हिरासत में लेते समय बल प्रयोग किया गया.
दिल्ली के कनॉट प्लेस में महिला पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार की शिकायतें भी सामने आईं. Maktoob Media से जुड़ी पत्रकारों ने आरोप लगाया कि कुछ लोगों ने उन्हें घेरकर आपत्तिजनक और इस्लामोफोबिक टिप्पणियां कीं. इन घटनाओं के दौरान पुलिसकर्मियों की मौजूदगी को लेकर भी सवाल उठाए गए.
अहमदाबाद और पुणे में भी हुई कार्रवाई
अहमदाबाद में Alt News की पत्रकार किंजल और पुणे में Scroll की पत्रकार दिव्या असलेशा को भी प्रदर्शन कवर करते समय हिरासत में लिया गया. मुंबई में 11 अक्टूबर को The Quint के दो पत्रकारों को भी प्रदर्शन की रिपोर्टिंग के दौरान हिरासत में लिए जाने की जानकारी दी गई.
मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर हो रहा था विरोध
इन प्रदर्शनों का संबंध मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर उठाए गए सवालों से था. प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि मतदाता सूची में बदलाव के दौरान पात्र मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं. हालांकि, चुनाव आयोग और केंद्र सरकार इन आरोपों से असहमत हैं. प्रदर्शनों का आयोजन Cockroach Janata Party (CJP), छात्र संगठनों और अन्य समूहों की ओर से किया गया था.
पत्रकारों की रिहाई और प्रेस की स्वतंत्रता पर उठे सवाल
CPJ ने दिल्ली पुलिस से हिरासत में लिए गए पत्रकारों को रिहा करने, उनके उपकरण लौटाने और कथित मारपीट की जांच कराने की मांग की. संगठन ने कहा कि पत्रकारों को सार्वजनिक हित से जुड़े मामलों की रिपोर्टिंग बिना बाधा के करने का अवसर मिलना चाहिए.
रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट में 11 अक्टूबर को हुई कार्यवाही के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आश्वासन दिया था कि वकीलों, पत्रकारों और अन्य पेशेवरों को अपने काम में बाधा का सामना नहीं करना पड़ेगा. इसके बावजूद पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने की शिकायतें सामने आईं.
इन घटनाओं ने प्रदर्शन स्थलों पर पत्रकारों की सुरक्षा और स्वतंत्र रिपोर्टिंग के अधिकार को लेकर बहस तेज कर दी है. अब इस मामले में पुलिस की कार्रवाई और पत्रकारों द्वारा लगाए गए आरोपों की जांच पर नजर बनी हुई है.


