
Jharkhand High Court: झारखंड HC ने सामूहिक दुष्कर्म के एक गंभीर मामले में दोषियों की अपील को सिरे से खारिज करते हुए उनकी 20 साल के कठोर कारावास की सजा को पूरी तरह बरकरार रखा है। जस्टिस आनंद सेन और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने जमशेदपुर सिविल कोर्ट की फास्ट ट्रैक कोर्ट द्वारा अगस्त 2018 में सुनाए गए फैसले को सही ठहराया। निचली अदालत ने सभी दोषियों को 20 साल के कठोर कारावास के साथ 40-40 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी, जिसके खिलाफ दोषियों ने HC का दरवाजा खटखटाया था। अदालत ने अपने फैसले में साफ कर दिया कि अपराध की गंभीरता और रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों को देखते हुए दोषियों को कोई भी राहत नहीं दी जा सकती।

पीड़िता की गवाही पर मुहर
अदालत ने सुनवाई के दौरान पीड़िता की गवाही को पूरी तरह विश्वसनीय और अचूक माना। HC ने स्पष्ट किया कि FIR दर्ज कराने में तीन दिन की देरी होना, शुरुआत में आरोपियों के नाम न जान पाना या मेडिकल जांच में वीर्य न मिलना, पीड़िता की गवाही को खारिज करने का आधार कभी नहीं बन सकते। कोर्ट ने कहा कि पीड़िता एक अशिक्षित ग्रामीण विधवा महिला थी और स्थानीय परंपरा के अनुसार पुलिस के पास जाने से पहले गांव में पंचायत बुलाई गई थी। पीड़िता को आरोपियों के नाम भले ही पंचायत में पता चले हों, लेकिन उसने कोर्ट के सामने सभी आरोपियों को उनके चेहरों से साफ तौर पर पहचान लिया था।

चोट के निशान बने सबूत
मामले के अनुसार 5 नवंबर 2013 को पीड़िता अपने ससुराल से मायके जा रही थी, तभी लापिट छेंचा जंगल में आरोपियों ने उसे जबरन पकड़कर नाले की तरफ ले जाकर इस वारदात को अंजाम दिया था। HC ने इस तथ्य पर विशेष जोर दिया कि घटना के बाद पीड़िता के शरीर, पीठ, कलाई और पैरों पर मिले गंभीर चोटों के निशान उसके साथ हुई दरिंदगी और हिंसा की पूरी पुष्टि करते हैं। घटना के करीब 72 घंटे बाद मेडिकल जांच होने और महिला की उम्र को देखते हुए रिपोर्ट में वीर्य न मिलना कोई अस्वाभाविक बात नहीं है। आरोपियों द्वारा झूठे केस में फंसाए जाने के दावे के पक्ष में कोई साक्ष्य न मिलने पर HC ने सभी अपीलें खारिज कर दीं।


