Kerala High Court: केरल हाईकोर्ट ने 73 वर्षीय एक बुजुर्ग महिला के साथ दुष्कर्म और यौन उत्पीड़न करने वाले 61 साल के व्यक्ति को तगड़ा झटका दिया है। अदालत ने दोषी की पुनर्विचार याचिका को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई 10 साल के कठोर कारावास की सजा को पूरी तरह बरकरार रखा है। दोषी ने खुद को आध्यात्मिक सलाहकार बताते हुए महिला के शरीर से बुरी आत्माओं को बाहर निकालने और इलाज का झूठा नाटक रचकर इस घिनौनी वारदात को अंजाम दिया था।

ट्रायल कोर्ट ने मुकर्रर की थी 10 साल की सजा
त्रिशूर की एक विशेष अदालत ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता के तहत दुष्कर्म के जुर्म में 10 साल के कठोर कारावास और एक लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसके साथ ही यौन उत्पीड़न के मामले में तीन साल की सजा और 25 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था। जस्टिस ए. बदरुद्दीन की पीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अपराध की गंभीरता और संवेदनहीनता को देखते हुए ट्रायल कोर्ट की सजा बिल्कुल वाजिब है और इसमें किसी भी तरह की दखलअंदाजी की गुंजाइश नहीं है।

अकेलेपन का फायदा उठाकर घर में घुसा था कथित तांत्रिक
अभियोजन के अनुसार पीड़िता अपनी बहू और दो पोते-पोतियों के साथ रहती थी। अक्टूबर 2022 के पहले हफ्ते में बहू बच्चों को लेकर एक रिश्तेदार के यहां गई हुई थी। पीड़िता का बेटा विदेश में रहता था और उसने ही मां को एक आध्यात्मिक सलाहकार का नंबर देकर फोन करने को कहा था। महिला के संपर्क करने पर आरोपी उसके घर पहुंचा और दावा किया कि उसके भीतर कई बुरी आत्माएं और मूर्तियां समाई हुई हैं, जिन्हें निकालना बेहद जरूरी है। इसके बाद आरोपी ने कथित झाड़-फूंक और आध्यात्मिक उपचार के नाम पर बुजुर्ग महिला के साथ जबरन दुष्कर्म किया।
तारीख में बदलाव और 19 दिन की देरी पर हाईकोर्ट का रुख
दोषी के वकील ने दलील दी थी कि महिला ने शुरुआत में 7 अक्टूबर की घटना बताई और बाद में तारीख बदलकर 8 अक्टूबर कर दी। इसके अलावा शिकायत दर्ज कराने में 19 दिन की देरी की गई। इन तर्कों को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि केवल तारीख के मामूली अंतर या मानवीय भूल के आधार पर पीड़िता की गवाही को झूठा नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने दोनों के बीच 8 अक्टूबर को हुई तीन कॉल के रिकॉर्ड को अहम सबूत माना। वहीं शिकायत में हुई 19 दिन की देरी पर अदालत ने कहा कि जब मामला किसी बुजुर्ग महिला से जुड़ा हो, तो परिवार से विमर्श और संकोच के चलते हुई देरी अभियोजन को कमजोर नहीं बनाती।
चोट के निशान न मिलने पर अदालत की दो टूक
बचाव पक्ष ने यह भी दावा किया था कि घटना के 20 दिन बाद हुए मेडिकल परीक्षण में महिला के शरीर पर चोट के कोई बाहरी निशान नहीं मिले थे। इस पर अदालत ने डॉक्टर के बयान का हवाला देते हुए कहा कि 20 दिन का लंबा समय बीत जाने के कारण किसी भी तरह की हल्की खरोंच या चोट अपने आप ठीक हो सकती है। बाहरी चोट का न दिखना इस बात का कतई सबूत नहीं है कि महिला के साथ यौन हमला नहीं हुआ था। इसके अलावा आरोपी द्वारा गढ़े गए संपत्ति विवाद के दावों को भी अदालत ने पूरी तरह निराधार बताते हुए खारिज कर दिया।


