Neha Bora: ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की प्रेसिडेंट नेहा बोरा के पर्सनल बॉन्ड मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने मैराथन सुनवाई पूरी कर ली है। स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) के उस नोटिस के खिलाफ दायर याचिका पर कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है, जिस पर शुक्रवार को अंतिम आदेश आएगा। इस नोटिस के जरिए नेहा से शांति बनाए रखने के नाम पर 10 हजार रुपये का पर्सनल बॉन्ड और एक जमानतदार पेश करने का फरमान जारी किया गया था। कोर्ट रूम में दोनों पक्षों के बीच जोरदार बहस देखने को मिली।

15 मिनट में उठा लिया
नेहा बोरा की तरफ से सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने मोर्चा संभाला। उन्होंने कोर्ट को बताया कि जंतर-मंतर को अचानक प्रदर्शन स्थलों की लिस्ट से हटाने के विरोध में 16 अक्टूबर को मंडी हाउस में शांतिपूर्ण ढंग से जुटने की अपील की गई थी। उस सोशल मीडिया पोस्ट में न तो कोई हिंसा भड़काने की बात थी और न ही कानून तोड़ने की।

शंकरनारायणन ने साफ कहा कि नेहा जैसे ही मंडी हाउस पहुंचीं, महज 10 से 15 मिनट के भीतर पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया। रात में आरके पुरम थाने ले जाया गया और सुबह तक न परिवार को खबर दी गई, न ही वकील से बात करने दी गई। बचाव पक्ष ने सीधे शब्दों में कहा कि सिर्फ नारे लगाने भर से कोई अपराधी नहीं बन जाता और नोटिस के शुरुआती स्टेज पर ही बॉन्ड मांगना पूरी तरह गैरकानूनी है।
‘रिजीम चेंज’ का नैरेटिव
दूसरी तरफ राज्य सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा ने मोर्चा संभाला। उन्होंने कहा कि उस समय इलाके में BNSS की धारा 163 यानी निषेधाज्ञा लागू थी और मौके पर पुलिसकर्मियों के मुकाबले प्रदर्शनकारियों की भीड़ काफी ज्यादा थी। एएसजी का दावा था कि नेहा पुलिस को देखकर रुकी नहीं, बल्कि बचकर कनॉट प्लेस की तरफ भागीं।
सरकार की तरफ से कोर्ट में दलील दी गई कि नेहा पर पहले से छह एफआईआर दर्ज हैं और उन्होंने कई बार नियमों को तोड़ा है। एएसजी ने एक बैठक का जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि वहां ‘रिजीम चेंज’ यानी सरकार बदलने की बातें कही गई थीं। इस पर जब बचाव पक्ष ने कहा कि लोकतंत्र में सत्ता बदलना कोई गलत बात नहीं है, तो एएसजी ने पलटवार किया कि सत्ता का फैसला चुनाव और वोट से होता है, न कि सड़कों पर भीड़ जुटाकर राजधानी में माहौल बिगाड़ने से। सरकार का तर्क था कि दिल्ली में अफरा-तफरी रोकने के लिए यह एहतियाती कदम उठाया गया था।
कोर्ट के तीखे सवाल
दिल्ली हाईकोर्ट ने पूरी सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की कार्रवाई पर कई कड़े सवाल दागे। कोर्ट ने पूछा कि क्या केवल नारे लगाने की सूचना मिलने पर बिना किसी स्वतंत्र जांच के सीधे कारण बताओ नोटिस थमाया जा सकता है? क्या पुलिस के कलंदरे के अलावा मजिस्ट्रेट ने खुद कोई जमीनी हकीकत परखी थी?
अदालत ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह के नोटिस से तो ऐसा लगता है कि किसी शख्स को पहले ही ‘खराब आचरण वाला’ मान लिया गया और फिर उससे अच्छे बर्ताव की गारंटी मांगी जा रही है। कोर्ट ने कहा कि किसी के चरित्र पर ऐसा दाग लगाना सीधे तौर पर संविधान के आर्टिकल 21 यानी जीवन और निजी स्वतंत्रता के अधिकार से जुड़ा मामला है।
दोनों पक्षों की लंबी जिरह, संविधान पीठ के फैसलों और नए कानूनों की धाराओं पर बहस सुनने के बाद हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है, जिस पर कल आदेश जारी होगा।


