
क्या सरकार से सवाल पूछना गुनाह है? क्या किसी विधायक के बयान को जनता तक पहुंचाना इतना बड़ा अपराध है कि एक न्यूज चैनल की खबर को इंटरनेट से हटाना पड़े? और अगर वीडियो हटाने की कार्रवाई कानून के तहत की गई, तो उसके पीछे की वजह स्पष्ट क्यों नहीं होनी चाहिए?

ये सवाल इसलिए उठ रहे हैं, क्योंकि नक्षत्र समाचार की एक खबर को लेकर नया विवाद सामने आया है। इस खबर में विधायक पप्पू वर्मा के उस बयान को दिखाया गया था, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि अरवल की SP Navjot Simi को हटवाने में उनकी भूमिका रही। अपने बयान में उन्होंने सम्राट चौधरी के सहयोग का भी जिक्र किया था। हालांकि, विधायक के इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि होना अलग विषय है।

Pappu Verma के बयान वाली खबर पर क्या हुई कार्रवाई?
नक्षत्र समाचार के मुताबिक, संबंधित वीडियो को लेकर भारत सरकार की ओर से सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, Meta ने 2000 की धारा 79(3)(b) का हवाला देते हुए नोटिस दिया गया। इसके बाद वीडियो इंटरनेट से हटा दिया गया।
अब सवाल यह है कि आखिर इस कार्रवाई का आधार क्या था? क्या खबर की किसी खास सामग्री पर आपत्ति जताई गई थी? क्या संबंधित पक्ष को इसकी विस्तृत जानकारी दी गई? इन सवालों के जवाब सामने आना जरूरी है, ताकि पूरे मामले की स्थिति स्पष्ट हो सके।
क्या मीडिया को जनप्रतिनिधियों से सवाल पूछने का अधिकार नहीं?
लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों के बयान जनता तक पहुंचाना और उनसे जुड़े जनहित के सवाल उठाना पत्रकारिता की अहम जिम्मेदारी है। जब कोई नेता किसी प्रशासनिक अधिकारी को हटवाने में अपनी भूमिका का दावा करता है, तो उस बयान की पड़ताल करना और उसका संदर्भ जनता के सामने रखना भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। प्रेस की स्वतंत्रता भी इसी संवैधानिक संरक्षण से जुड़ी है। हालांकि, यह अधिकार पूर्ण नहीं है। संविधान का अनुच्छेद 19(2) निर्धारित आधारों पर उचित प्रतिबंधों की अनुमति देता है।
इसलिए इस मामले में मूल सवाल सिर्फ वीडियो हटाए जाने का नहीं, बल्कि उस कार्रवाई के कानूनी आधार, प्रक्रिया और पारदर्शिता का भी है।
धारा 79(3)(b) का नोटिस और कार्रवाई का आधार क्यों अहम?
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79 इंटरनेट मध्यस्थों की कानूनी जिम्मेदारी और कुछ परिस्थितियों में मिलने वाले संरक्षण से संबंधित है। इसकी उपधारा 79(3)(b) में कानून के उल्लंघन से जुड़ी सामग्री की जानकारी मिलने पर मध्यस्थ द्वारा कार्रवाई न करने की स्थिति का उल्लेख है।

लेकिन इस मामले में नोटिस की वास्तविक भाषा, उसमें बताए गए आधार और संबंधित आदेश की स्थिति को देखे बिना यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि वीडियो हटाने की कार्रवाई कानूनी रूप से सही थी या गलत।
नक्षत्र समाचार का सवाल है कि संबंधित सामग्री पर आपत्ति थी, तो उसके पीछे का आधार स्पष्ट होना चाहिए। इससे चैनल को मामले को समझने और उपलब्ध कानूनी उपायों पर विचार करने में मदद मिल सकती है।
सरकार से सवाल: कार्रवाई का आधार स्पष्ट होगा?
यह मामला पत्रकारिता की स्वतंत्रता, डिजिटल प्लेटफॉर्म पर समाचार सामग्री की उपलब्धता और सरकारी कार्रवाई में पारदर्शिता जैसे अहम मुद्दे उठाता है।
यदि किसी खबर में गलती है, तो उसे सुधारने की जरूरत है। यदि किसी सामग्री में कानून का उल्लंघन हुआ है, तो कानून के मुताबिक कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन संबंधित कार्रवाई का आधार समझना और उपलब्ध कानूनी प्रक्रिया का इस्तेमाल करना भी महत्वपूर्ण है।
अब सवाल यही है—क्या इस मामले में वीडियो हटाने की कार्रवाई के पीछे का आधार सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाएगा? क्या संबंधित चैनल को आपत्ति और कार्रवाई के कारणों की पर्याप्त जानकारी मिलेगी?


