
औरंगाबाद: डिजिटल और मोबाइल के दौर में जब पारंपरिक लोककलाओं के सामने अस्तित्व बचाने की चुनौती है, तब बिहार के औरंगाबाद जिले के एक गांव ने अपनी सांस्कृतिक विरासत को संजोकर रखा है। नवीनगर प्रखंड की नाउर पंचायत के बाघाडाबर गांव में पिछले 61 वर्षों से दुर्गापूजा की नवमी पर नाटक मंचन की परंपरा निभाई जा रही है। इस वर्ष भी गांव के 11 स्टार क्लब की ओर से ‘इज्जत’ नाटक का मंचन किया गया, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में महिला और पुरुष दर्शक जुटे।

स्थानीय कलाकारों ने अपने अभिनय के जरिए दर्शकों का मनोरंजन करने के साथ सामाजिक कुरीतियों और पारिवारिक मूल्यों का संदेश भी दिया। गांव की यह पहल बताती है कि आधुनिक तकनीक के बढ़ते प्रभाव के बीच भी सामुदायिक प्रयासों से लोककला को जीवित रखा जा सकता है।

छह दशक पहले ग्रामीणों ने रखी थी नींव
गांव के पूर्व मुखिया ओमप्रकाश सिंह के मुताबिक, करीब छह दशक पहले राजेश्वर ठाकुर, रामप्रसाद पासवान, नागा राम, सोनू चौधरी, अजय सिंह, शिवशंकर पासवान सहित कई ग्रामीणों ने इस नाट्य परंपरा की शुरुआत की थी।
शुरुआती दौर में शिवशंकर पासवान नाटकों का निर्देशन करते थे। अब पिछले 10 वर्षों से रामकुमार और मुन्ना सिंह निर्देशन की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती यह परंपरा आज भी गांव के लोगों को एक मंच पर जोड़ रही है।
‘यह सिर्फ नाटक नहीं, हमारे गांव की पहचान है’
पूर्व मुखिया पप्पू सिंह ने इस परंपरा के महत्व को बताते हुए कहा कि उनके पूर्वजों ने 61 साल पहले जो दीपक जलाया था, उसे 11 स्टार क्लब के युवा आज भी जलाए हुए हैं। उनके मुताबिक, यह आयोजन केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि गांव की पहचान और संस्कारों का हिस्सा है।
उन्होंने कहा कि डिजिटल युग में जब बच्चे मोबाइल फोन में अधिक समय बिताते हैं, तब ‘इज्जत’ जैसे नाटक के जरिए समाज को संदेश देना महत्वपूर्ण है। सीमित संसाधनों के बावजूद गांव के अलग-अलग जाति और धर्म के लोग मिलकर इस आयोजन को सफल बनाते हैं, जो आपसी एकता का उदाहरण है।
पप्पू सिंह ने नई पीढ़ी से इस विरासत को बचाए रखने की अपील की। साथ ही, उन्होंने प्रशासन से भी पारंपरिक लोककलाओं के संरक्षण के लिए सहयोग देने की जरूरत बताई।
मोबाइल के दौर में मंच से समाज को संदेश
ग्रामीणों का कहना है कि आज की युवा पीढ़ी का काफी समय मोबाइल फोन पर बीतता है। ऐसे में पारंपरिक नाटक और लोककलाओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है। उनका मानना है कि यदि समय रहते इन कलाओं के संरक्षण के प्रयास नहीं किए गए, तो आने वाले समय में नाटक जैसी विधाएं केवल किताबों तक सीमित रह सकती हैं।
बाघाडाबर की 61 साल पुरानी नाट्य परंपरा इस बात की मिसाल है कि संस्कृति को जीवित रखने के लिए बड़े संसाधनों से ज्यादा सामूहिक इच्छाशक्ति और लोगों की भागीदारी जरूरी है। यहां हर साल मंच सजता है, कलाकार अपनी भूमिका निभाते हैं और गांव के लोग अपनी विरासत से जुड़ते हैं।
(विकाश चन्दन की रिपोर्ट)


